नई दिल्ली: आगामी हॉकी विश्व कप (नीदरलैंड और बेल्जियम) से ठीक पहले भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की जर्सी का रंग पारंपरिक ‘नीले’ से बदलकर ‘केसरिया’ करने पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय हॉकी के दिग्गज खिलाड़ियों और पूर्व कप्तानों—धनराज पिल्लै और परगट सिंह—ने जर्सी का रंग बदलने के फैसले पर अपनी कड़ी असहमति व्यक्त की है।
प्रमुख बिंदु और दिग्गजों की राय:
धनराज पिल्लै (पूर्व कप्तान एवं महान फॉरवर्ड):
ऐतिहासिक पहचान: 1928 के दौर (मेजर ध्यानचंद और बलबीर सिंह सीनियर) से लेकर 1980 मॉस्को ओलंपिक और हाल के दशकों तक, भारतीय हॉकी की पहचान हमेशा से नीली जर्सी रही है।
राष्ट्रीय टीम बनाम फ्रेंचाइजी: राष्ट्रीय टीम की अपनी एक स्थाई पहचान होती है। यह कोई आईपीएल (IPL) या हॉकी इंडिया लीग (HIL) जैसी फ्रेंचाइजी लीग नहीं है, जहां जर्सी का रंग बार-बार बदला जाए।
तकनीकी दलील पर सवाल: नीले टर्फ पर नीली जर्सी से दृश्यता (visibility) में परेशानी होने की दलील को उन्होंने खारिज करते हुए कहा कि पिछले 5-6 वर्षों में ऐसी कोई समस्या नहीं देखी गई।
परगट सिंह (पूर्व कप्तान एवं पूर्व महान डिफेंडर):
खेल की निष्पक्षता: खेल राष्ट्र का गौरव हैं और इन्हें राजनीति, धर्म या जाति से परे रखा जाना चाहिए। खेलों में इस तरह के बदलाव दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
पहचान का संकट: नारंगी/केसरिया रंग अंतरराष्ट्रीय हॉकी में नीदरलैंड की पहचान है। भारतीय खिलाड़ी दशकों से नीले रंग से खुद को जोड़ते आए हैं।
वैकल्पिक विकल्प: मुख्य जर्सी का रंग बदलने के बजाय आवश्यकता पड़ने पर सफेद रंग की ‘अवे (away)’ जर्सी का इस्तेमाल किया जा सकता था
हॉकी इंडिया का स्पष्टीकरण:
पूर्व कप्तान वीरेन रासकिन्हा और अन्य दिग्गजों द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद हॉकी इंडिया ने सफाई जारी की है। हॉकी इंडिया के अनुसार, नीले रंग के एस्ट्रोटर्फ पर मैच के दौरान खिलाड़ियों को होने वाली तकनीकी दिक्कतों के कारण कोचों और खिलाड़ियों के अनुरोध पर यह निर्णय लिया गया है।
समाचार सार: भारतीय हॉकी में नीली जर्सी केवल एक पहनावा नहीं, बल्कि देश के महान हॉकी इतिहास और पहचान का प्रतीक रही है। विश्व कप से ठीक पहले हुआ यह बदलाव खेल जगत में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।
