क्या NSE है ‘पब्लिक अथॉरिटी’? RTI एक्ट में शामिल करने के हाईकोर्ट और CIC के आदेश पर SC की रोक

NSE RTI Act Case: सुप्रीम कोर्ट ने NSE को RTI के दायरे में लाने वाले फैसले पर लगाई रोक, CIC और केंद्र को नोटिस
​नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे बड़े शेयर बाजार, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (NSE) को सूचना का अधिकार कानून (RTI Act, 2005) के दायरे में लाने वाले केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर NSE की याचिका पर आया है, जिसमें एक्सचेंज को धारा 2(h) के तहत “पब्लिक अथॉरिटी” (सार्वजनिक प्राधिकरण) माना गया था।
​जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सभी पक्षों को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों को चार हफ़्तों के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। तब तक CIC द्वारा 7 जून, 2007 को पारित आदेश का असर और अमल निलंबित रहेगा।
​सॉलिसिटर जनरल के मुख्य तर्क: ‘NSE में सरकार की कोई हिस्सेदारी नहीं’
​NSE की ओर से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज RTI एक्ट की धारा 2(h) के तहत दिए गए “पब्लिक अथॉरिटी” के मापदंडों को पूरा नहीं करता है।
​उन्होंने ‘थलाप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए आग्रह किया कि अदालत कानून में दी गई परिभाषा और सार्वजनिक प्राधिकरण के वास्तविक दायरे की जांच करे।
​सॉलिसिटर जनरल ने अपनी दलीलों में मुख्य बातें रखीं:
​शेयरहोल्डिंग संरचना: NSE में लगभग 40% घरेलू निवेशक और करीब 27% से 30% विदेशी निवेशक हैं। इसमें सरकार की 0% हिस्सेदारी है।
​स्थापना का आधार: एक्सचेंज की स्थापना न तो संविधान के तहत हुई है, न ही संसद/राज्य विधानसभा के किसी विशेष कानून द्वारा और न ही किसी सरकारी अधिसूचना द्वारा। यह कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत एक निजी संस्था है।
​पारदर्शिता का रुख: सुनवाई के दौरान जब जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की कि यह “पारदर्शिता का दौर” है, तो सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि NSE अपनी वेबसाइट पर पहले से ही विस्तृत जानकारी और वित्तीय आंकड़े सार्वजनिक करता है।
​19 साल पुराना है यह विवाद: जानिए पूरा घटनाक्रम
​यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ था जब एक RTI आवेदक ने NSE से कुछ जानकारी मांगी थी। NSE द्वारा जानकारी देने से इनकार करने पर मामला केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) पहुंचा।
​7 जून 2007 (CIC का आदेश): CIC ने माना कि शेयर बाजार में जनता का हित शामिल है और SEBI का इस पर कड़ा नियंत्रण है, इसलिए यह RTI की धारा 2(h) के तहत ‘पब्लिक अथॉरिटी’ है।
​अप्रैल 2010 (दिल्ली हाईकोर्ट – सिंगल जज): NSE ने इस फैसले को चुनौती दी। सिंगल जज बेंच ने NSE की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ‘पब्लिक अथॉरिटी’ शब्द को व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए और RTI का उद्देश्य पारदर्शिता लाना है।
​मई 2010 (हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का स्टे): NSE ने डिवीज़न बेंच में अपील की। 4 मई 2010 को डिवीज़न बेंच ने CIC के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जो जुलाई 2026 तक लागू रही।
​1 जुलाई 2026 (हाईकोर्ट का अंतिम फैसला): दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने NSE की अपील खारिज कर दी और सिंगल जज के फैसले को सही ठहराया।
​अगस्त 2026 (सुप्रीम कोर्ट का स्टे): हाईकोर्ट के इस अंतिम फैसले के खिलाफ NSE सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अब शीर्ष अदालत ने अंतरिम रोक (Stay) बढ़ाते हुए CIC और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
​इस फैसले का क्या होगा असर?
​सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल आम नागरिक RTI अधिनियम के तहत NSE से सीधे तौर पर जानकारी मांगने के हकदार नहीं होंगे। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और इस कानूनी बिंदु पर आने वाले अंतिम फैसले पर टिकी हैं कि क्या SEBI द्वारा विनियमित संस्थाएं केवल सरकारी नियंत्रण के आधार पर RTI के दायरे में आ सकती हैं या नहीं।

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